Himmat itni thi

himmat itni thi

हिम्मत इतनी थी की समंदर भी पार कर सकते थे
मजबूर इतने हुए कि दो बूँद आँसुओ ने डुबो दिया

वक़्त नूर को बेनूर कर देता है
छोटे से जख्म को नासूर कर देता है
कौन चाहता है अपनों से दूर रहना
पर वक़्त सबको मजबूर कर देता है

जो कभी किया ना असर शराब ने
वो तेरी आँखों वे कर दिया
सजा़ देना तो मेरी मुठ्ठी मे थी
मुझे हि कैद तेरी सलाखों ने कर दिया

न पूछो हालत मेरी रूसवाई के बाद
मंजिल खो गयी है मेरी जुदाई के बाद
नजर को घेरती है हरपल घटा यादों की
गुमनाम हो गया हूँ गम-ए-तन्हाई के बाद

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